(राजीव) 15 अगस्त हमारे लिए स्वतंत्रता, गौरव और राष्ट्रीय उत्सव का दिन है। हर वर्ष यह दिवस देशभर में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन स्वतंत्रता की इस खुशी के साथ इतिहास में विभाजन की वह पीड़ा भी जुड़ी है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब एक ओर देशवासियों में आजादी की खुशी थी, तो दूसरी ओर विभाजन ने करोड़ों लोगों के जीवन में गहरा दर्द और विस्थापन की त्रासदी ला दी।
1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों को यह एहसास हो गया था कि भारत की एकता और अखंडता उनके लिए बड़ी चुनौती है। इसके बाद उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के माध्यम से भारतीय समाज में विभाजन की खाई को गहरा करने का प्रयास किया। इस दौर में भारतीय उपमहाद्वीप की सीमाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में कई बड़े बदलाव हुए, जिनका प्रभाव आगे चलकर भारत के भूगोल, समाज और राजनीति पर पड़ा।
आजादी के दशकों बाद भी यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि क्या केवल भौगोलिक स्वतंत्रता ही वास्तविक स्वतंत्रता है? सच्ची आजादी तब होगी, जब हम मानसिक गुलामी, संकीर्ण सोच, जातीय भेदभाव, स्वार्थ, अहंकार और समाज को बांटने वाली प्रवृत्तियों से भी मुक्त होंगे।
आज भी अंग्रेजी सभ्यता और जीवनशैली का अंधानुकरण, जातिगत विभाजन, अदूरदर्शी नीतियां और सामाजिक वैमनस्य हमारे सामने चुनौतियां हैं। हमें प्रत्येक नागरिक को उसकी योग्यता, प्रतिभा और कर्म के आधार पर सम्मान देने वाली व्यवस्था और ऐसी सोच विकसित करनी होगी, जो समाज को जोड़ने का काम करे।
वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं, बल्कि विचारों और चेतना की स्वतंत्रता भी है। यदि हम भारत को सशक्त, समरस और विकसित राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हमें अपनी संकीर्णताओं से ऊपर उठकर भारतीय होने की भावना को मजबूत करना होगा।
स्वतंत्रता दिवस हमें उन असंख्य शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान को याद करने का अवसर देता है, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनके सपनों का भारत बनाने के लिए हमें अपने राष्ट्रधर्म, कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति दृढ़ संकल्पित होना होगा।
आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम संकल्प लें कि देश की एकता, अखंडता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने में अपना योगदान देंगे।
जय हिंद!