विभाजन की विभीषिका से जन्मी ‘ज्ञान की ज्योति’: प्रो. विश्वा मित्र जी का संघर्षों से विभागाध्यक्ष तक का सफर

देहरादूनः सन् 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की उस भयानक विभीषिका के दौरान, जब लाखों परिवार एक-दूसरे से बिछड़ रहे थे और चारों ओर अव्यवस्था का माहौल था, उसी समय एक 12 वर्षीय दृष्टिहीन बालक, विश्वा मित्र, ने अपने भाई के साथ अकेले पाकिस्तान से हिंदुस्तान की ओर निकलने का अडिग साहस दिखाया। छोटी-सी उम्र में बिना किसी सहारे के किया गया यह सफर मात्र एक विस्थापन नहीं था, बल्कि उनके जीवन के उस संकल्प की नींव थी—जीवन में कुछ बनकर समाज को दिशा देने का जुनून।

संघर्षों से तेजस्वी बनी ज्ञान की यात्रा
विश्वा मित्र जी ने अपनी शारीरिक सीमाओं को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। कठिन परिस्थितियों, भीषण आर्थिक अभाव और दृष्टिहीनता के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प और साहस के बल पर उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने तीन अलग-अलग विषयों में स्नातकोत्तर (Post-Graduate) की उपाधि प्राप्त की, जो शिक्षा के प्रति उनके समर्पण का अद्भुत प्रमाण है। अपने अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप, उन्होंने कॉलेज प्रोफेसर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और अपनी योग्यता के दम पर विभागाध्यक्ष (Head of Department) के प्रतिष्ठित पद तक पहुँचे।

“दृष्टि नहीं, दृष्टिकोण मायने रखता है”
उनके विद्यार्थी आज भी विश्वा मित्र जी की कक्षाओं को याद करते हैं। छात्रों के अनुसार, उनका संगीत का गहरा ज्ञान, विषयों की समझ और व्यक्तित्व की ऊष्मा किसी भी भौतिक प्रकाश से कहीं अधिक तेजस्वी थी। उन्होंने जीवन भर अपने इस आदर्श को प्रमाणित किया कि “दृष्टि नहीं, दृष्टिकोण मायने रखता है।” वे सादगी, अनुशासन, और अथक मेहनत को अपने व्यक्तित्व की पहचान मानते थे। अपने पूरे जीवनकाल में उन्होंने ईमानदारी, आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों को हमेशा सर्वोपरि रखा। जिन्होंने भी उन्हें नजदीक से जाना, वे उन्हें न केवल एक गुरु और मार्गदर्शक के रूप में, बल्कि एक अमर प्रेरणास्रोत के रूप में याद करते हैं।

अमर आदर्शों की अमर सीख
विश्वा मित्र जी के निधन को एक माह बीत चुका है, लेकिन उनके द्वारा स्थापित आदर्श, दिए गए संस्कार और सीख आज भी समाज में उतनी ही जीवित हैं। उनकी स्मृतियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि जब मनुष्य अपने भीतर के साहस और अडिग संकल्प के साथ खड़ा होता है, तब कोई भी बाहरी परिस्थिति उसे उसके लक्ष्य से नहीं रोक सकती। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, उनके परिजन, मित्र, सहकर्मी और हजारों विद्यार्थी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि “एक ज्योति बुझी नहीं, अनगिनत दीप जला गई।” उनका जीवन संघर्ष और शिक्षा की शक्ति का एक जीवंत उदाहरण है। श्रद्धांजलि देने वालों में अवधेश पंत (मामा जी), आशा शर्मा (पत्नी), और प्रशांत शर्मा (पुत्र) प्रमुख हैं, जिन्होंने उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है।