रंगायन एसोसिएशन के रंगोत्सव का समापन, ‘अजब गजब की पाठशाला’ ने दिया प्रेरक संदेश

देहरादून। उत्तराखंड की प्रमुख सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था रंगायन एसोसिएशन के दो दिवसीय रंगोत्सव का समापन आईआरडीटी सभागार में नाटक ‘अजब गजब की पाठशाला’ के मंचन और प्रदेश के वरिष्ठ रंगकर्मियों के सम्मान समारोह के साथ हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने दीप प्रज्ज्वलित कर रंगोत्सव का शुभारंभ किया।

रंगायन एसोसिएशन की निदेशक निवेदिता बौंठियाल के निर्देशन एवं रूपांतरण में प्रस्तुत नाटक ‘अजब गजब की पाठशाला’ में देहरादून के 32 कलाकारों ने प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों का मन मोह लिया। नाटक में गायन, नृत्य, व्यंग्य और मनोरंजन के साथ बच्चों को नैतिक मूल्यों का संदेश दिया गया। कहानी के अंत में गुरुजी बच्चों को अच्छे कर्मों और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं तथा बुरे कर्मों के दुष्परिणामों से अवगत कराते हैं।

नाटक में नवनीत गैरोला, विकास रावत, आदित्य गुप्ता, सुषमा बर्थवाल, अमित बौखण्डी, कुणाल पवार, प्रत्यूष कौशल, अमित सेमवाल, धनंजय कुकरेती सहित अन्य कलाकारों ने अभिनय किया। संगीत निर्देशन विकास रावत ने किया, जबकि गीतों को प्रिया उनियाल और राहुल सिंह शाह ने स्वर दिए। कलाकारों के अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर रंगायन एसोसिएशन ने रंगमंच और कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए वरिष्ठ रंगकर्मी अविनंदा, मुकेश धस्माना और गजेन्द्र वर्मा को ‘रंगायन सम्मान’ से सम्मानित किया। उन्हें शॉल ओढ़ाकर उनके योगदान का अभिनंदन किया गया।

मुख्य अतिथि सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि 1980 और 1990 के दशक में देहरादून सांस्कृतिक और रंगमंचीय गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था, जहां लोग टिकट खरीदकर नाटक देखने और राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलनों व मुशायरों में भाग लेने पहुंचते थे। उन्होंने कहा कि पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद साहित्य, कला और संगीत की गतिविधियों में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी, लेकिन रंगायन एसोसिएशन जैसे संस्थानों के प्रयासों से देहरादून की सांस्कृतिक पहचान को फिर से स्थापित करने की उम्मीद जगी है।

रंगायन एसोसिएशन की अध्यक्ष निवेदिता बौंठियाल ने सभी अतिथियों, कलाकारों, कला प्रेमियों और दर्शकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यदि इसी तरह सहयोग मिलता रहा तो देहरादून को कला, संस्कृति और संगीत के क्षेत्र में उसका पुराना गौरवशाली स्थान फिर से दिलाया जा सकेगा।