सांगला (किन्नौर) | हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत बस्पा घाटी (सांगला) इन दिनों रंगों और सदियों पुरानी परंपराओं के अनूठे संगम से सराबोर है। साल 2026 की यह होली बेहद खास बन गई है क्योंकि यहाँ विश्व प्रसिद्ध ‘फागुली’ उत्सव का आगाज हो चुका है। ताजा जानकारी के अनुसार, इस बार 3 मार्च को लगने वाले चंद्र ग्रहण के कारण स्थानीय परंपराओं में थोड़ा बदलाव किया गया है, जिसके चलते मुख्य उत्सव 2 मार्च से ही पूरे शबाब पर है।
घाटी के ऐतिहासिक बेरिंग नाग मंदिर में देवताओं की विशेष पूजा-अर्चना के साथ उत्सव की शुरुआत हुई। यहाँ स्थानीय ग्रामीणों ने पारंपरिक ‘टोटू’ (जौ और छाछ का खास प्रसाद) बांटकर एक-दूसरे को बधाई दी। इस साल पर्यटकों का भारी हुजूम उमड़ा है, जो बर्फ से ढकी चोटियों के साये में होने वाले ‘फागली’ मास्क डांस को देखने पहुंचे हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों, ढोल और नगाड़ों की थाप पर घास के लिबास और लकड़ी के मुखौटे पहने पुरुषों का नृत्य बुराई पर अच्छाई की जीत का जीवंत संदेश दे रहा है।
सांगला की इस होली की सबसे ‘मस्त’ बात ‘बर्फ और गुलाल’ का वो जबरदस्त तालमेल है, जो शायद ही कहीं और देखने को मिले। जहाँ एक तरफ रंगों की मस्ती है, वहीं दूसरी तरफ रामायण के पात्रों—राम, लक्ष्मण और रावण की पारंपरिक झांकियां पूरे गांव की गलियों में रौनक बिखेर रही हैं।
स्थानीय प्रशासन और होमस्टे मालिकों के मुताबिक, 4 मार्च तक चलने वाले इस मेले में ‘फासुर’ (स्थानीय पेय) और गरमा-गरम ‘सिड्डू’ जैसे पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद उत्सव के रोमांच को दोगुना कर रहा है। अगर आप भी संस्कृति और प्रकृति के इस जादुई मिलन का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो सांगला की गलियां और यहाँ की आतिथ्य सत्कार की परंपरा आपका तहे दिल से इंतज़ार कर रही है!
