उत्तरकाशी: उत्तराखंड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी में आयोजित होने वाला पारंपरिक ‘दूध गड्डू’ (Milk of festival) मेला स्थानीय लोक संस्कृति, आस्था और आपसी भाईचारे का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह सदियों पुराना त्योहार यमुना घाटी के आराध्य देवता सोमेश्वर महाराज के सम्मान में मनाया जाता है।
मेले का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व यह मेला यमुना घाटी के दो मुख्य क्षेत्रों – रवाईं और जौनपुर के बीच सद्भाव और एकता को दर्शाता है। मान्यता है कि इस दिन रवाईं क्षेत्र के ग्रामीण अपनी आराध्य देवी ‘शमरी’ (या समेश्वरी देवी) को डोली में लेकर रवाईं की सीमा पर पहुंचते हैं। वहीं, जौनपुर के ग्रामीण अपने देवता ‘सोमेश्वर महाराज’ की डोली को लेकर आते हैं। दोनों तरफ से श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।
दूध गड्डू की अनोखी परंपरा इस मेले का सबसे अनूठा हिस्सा ‘दूध गड्डू’ की परंपरा है। दोनों क्षेत्रों से आए श्रद्धालु, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल होते हैं, अपने-अपने पशुओं का दूध एक पात्र में इकट्ठा करते हैं। इस दूध को धार्मिक विधि-विधान के साथ दोनों देवताओं को अर्पित किया जाता है। माना जाता है कि यह दूध केवल एक सामान्य पेय नहीं, बल्कि दोनों क्षेत्रों के लोगों के बीच प्रेम, एकता और शांति का प्रतीक है। दूध के इस संगम को देखकर यह अहसास होता है कि भौगोलिक दूरियां होने के बावजूद, लोग आस्था और परंपरा के धागे से किस तरह मजबूती से जुड़े हुए हैं।
पर्यटन और संस्कृति का संगम यह मेला न केवल स्थानीय लोगों के लिए एक धार्मिक पर्व है, बल्कि यह देश और दुनिया के पर्यटकों के लिए भी एक आकर्षण का केंद्र बन रहा है। इस दौरान स्थानीय लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीण अपनी संस्कृति का प्रदर्शन करते हैं। यह एक ऐसा मंच है जहाँ लोग आधुनिकता से दूर अपनी जड़ों और परंपराओं को महसूस कर सकते हैं।
यह मेला हमें यह सिखाता है कि कैसे प्रकृति और देवताओं के प्रति सम्मान के साथ-साथ आपसी सौहार्द और भाईचारे को भी बनाए रखा जा सकता है। ‘दूध गड्डू’ मेला वास्तव में उत्तरकाशी की समृद्ध संस्कृति और परंपरा का जीवंत प्रमाण है।
