‘गोट वैली योजना’, 5,500 से अधिक लोगों को मिला लाभ: सौरभ बहुगुणा

देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘गोट वैली योजना’ ग्रामीणों के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रही है। पहाड़ों में बड़े उद्योगों और कंपनियों की सीमित उपलब्धता के बीच बकरी पालन के जरिए स्थानीय युवाओं और किसानों को रोजगार से जोड़ने की दिशा में योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसका उद्देश्य ग्रामीणों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पहाड़ों से होने वाले पलायन पर प्रभावी अंकुश लगाना भी है।

देहरादून जिले का चकराता क्षेत्र इस योजना के प्रमुख केंद्र के रूप में सामने आया है। यहां की भौगोलिक एवं जलवायु परिस्थितियां बकरी पालन के लिए अनुकूल होने के कारण बड़ी संख्या में किसान और युवा योजना से जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।

पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा ने बताया कि राज्य सरकार ने वर्ष 2022-23 में पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से ‘गोट वैली योजना’ शुरू की थी। नवंबर 2023 में इसे व्यापक स्तर पर लागू किया गया। योजना का मुख्य उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकना और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करना है।

उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि, पशुपालन और डेयरी व्यवसाय आजीविका के प्रमुख साधन हैं। ऐसे में पशुपालन विभाग बकरी पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने वाले लोगों को आवश्यक सहायता उपलब्ध करा रहा है।

16 बकरी-बकरों की यूनिट तैयार करने में मदद
योजना के तहत लाभार्थियों को पांच बकरियां खरीदने के लिए 30 हजार रुपये तक का आसान ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इसके बाद पशुपालन विभाग की ओर से 10 बकरियां और एक बकरा निशुल्क दिया जाता है। इस तरह लाभार्थी के पास कुल 16 बकरी-बकरों की यूनिट तैयार हो जाती है, जिसके माध्यम से वह नियमित आय अर्जित कर सकता है।

मंत्री के अनुसार, अब तक राज्य के करीब 5,500 लोग इस योजना का लाभ उठा चुके हैं और लगातार नए लाभार्थी इससे जुड़ रहे हैं।

आईटीबीपी से साझेदारी से बाजार की समस्या हुई दूर
सौरभ बहुगुणा ने बताया कि उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के साथ सीधे जुड़कर किसानों और पशुपालकों के लिए बाजार उपलब्ध कराने की पहल की है।

उन्होंने कहा कि पहले उत्तरकाशी समेत अन्य सीमांत क्षेत्रों के पशुपालकों को अपनी भेड़-बकरियां बेचने के लिए हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता था। कई मामलों में भुगतान मिलने में छह से आठ महीने तक का समय लग जाता था। आईटीबीपी के साथ साझेदारी के बाद पशुपालकों के लिए बिक्री और भुगतान की प्रक्रिया अधिक सरल एवं पारदर्शी हुई है।

जब पशुपालक अपने पशुओं को बेचने के लिए तैयार होते हैं, तो 48 घंटे के भीतर आईटीबीपी की टीम और पशु चिकित्सक मौके पर पहुंचकर पशुओं का स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं। इसके बाद भेड़-बकरियों एवं अन्य निर्धारित उत्पादों की खरीद की जाती है। किसानों के खातों में भी 48 घंटे के भीतर भुगतान पहुंचाने की व्यवस्था है। इससे बिचौलियों की भूमिका काफी हद तक समाप्त हुई है।

जागरूकता अभियान के जरिए किसानों को जोड़ रही सरकार
पशुपालन मंत्री ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बकरी पालन के प्रति लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है। विभाग की ओर से समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाकर ग्रामीणों को योजनाओं, प्रशिक्षण और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी दी जाती है।

मंत्री और विभागीय अधिकारी भी पशुपालकों से संवाद कर उनकी समस्याओं को सुनते हैं और नई नीतियों एवं सुविधाओं से उन्हें अवगत कराते हैं। सरकार का लक्ष्य अधिक से अधिक किसानों और युवाओं को योजना से जोड़कर उन्हें स्वरोजगार के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।

‘अपुणि सरकार’ पोर्टल से कर सकते हैं आवेदन
‘गोट वैली योजना’ का लाभ लेने के इच्छुक किसान और पशुपालक राज्य सरकार के ‘अपुणि सरकार’ पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

सरकार का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह योजना उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के साथ ही स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन का मजबूत माध्यम बनेगी। कृषि और पशुपालन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाली यह पहल स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग और लोगों को घर के नजदीक रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में एक प्रभावी मॉडल के रूप में विकसित हो रही है।