देहरादूनः उत्तराखंड के प्रमुख दून मेडिकल कॉलेज (Doon Medical College) में विशेषज्ञ डॉक्टरों का मोहभंग होता जा रहा है। कॉलेज में संविदा स्पेशलिस्ट और सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के 104 पदों पर भर्ती निकली थी, लेकिन इंटरव्यू देने के लिए केवल 3 डॉक्टर ही पहुंचे, जिसके कारण 101 पद अभी भी खाली रह गए हैं।
दून मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों के कम वेतन को मोहभंग का मुख्य कारण वेतन माना जा रहा है। डॉक्टरों को यहां मिलने वाला वेतन निजी अस्पतालों के मुकाबले दो से तीन गुना कम है। दून मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर को लगभग ₹95,000, एसोसिएट प्रोफेसर को ₹1.23 लाख, और प्रोफेसर को ₹1.43 लाख रुपये मिलते हैं। इसके विपरीत, निजी अस्पतालों में असिस्टेंट प्रोफेसर से प्रोफेसर स्तर तक ₹1.5 लाख से ₹3 लाख तक वेतन दिया जा रहा है। वेतन बढ़ोतरी के लिए कॉलेज और निदेशालय द्वारा भेजे गए दो प्रस्तावों को शासन स्तर पर खारिज कर दिया गया है। ‘यू कोट वी पे’ योजना को भी मेडिकल कॉलेजों में लागू करने से मना कर दिया गया है।
पहले भी दे चुके हैं इस्तीफे
वेतन कम होने के कारण कॉलेज से डॉक्टरों के इस्तीफे देने का सिलसिला जारी है। पिछले समय में, चार सर्जन (असिस्टेंट प्रोफेसर) समेत सात डॉक्टरों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया था। ये डॉक्टर सर्जरी, फिजियोलॉजी और गायनी विभाग से थे। इससे पहले भी महिला पीडियाट्रिक सर्जन, ईएनटी, कम्युनिटी मेडिसन और फिजियोलॉजी विभाग के वरिष्ठ डॉक्टर कॉलेज छोड़ चुके हैं, जिससे मरीजों की सर्जरी ठप हो गई है।
डॉक्टरों की इस भारी कमी के कारण अस्पताल में मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। न्यूरो, रेडियोलॉजी, कार्डियोलॉजी, सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, स्किन, कैंसर, टीबी चेस्ट, यूरोलॉजी और इमरजेंसी मेडिसिन जैसे महत्वपूर्ण विभागों में डॉक्टरों की कमी है।
मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों की कमी और उनके छोड़कर जाने के मामलों को देखते हुए, मेडिकल कॉलेजों से सुझाव मांगे गए हैं ताकि डॉक्टरों को संस्थान में रोके रखा जा सके। निदेशक और प्राचार्य स्तर पर वेतन बढ़ोतरी के लिए शासन से लगातार कोशिशें जारी हैं और जल्द ही कोई हल निकलने की उम्मीद है। अपर निदेशक ने कहा है कि सरकार ने सुपर स्पेशलिस्ट के वेतन बढ़ाए हैं।
इस तरह, दून मेडिकल कॉलेज में वेतन विसंगति के कारण विशेषज्ञ डॉक्टरों का आकर्षण कम हो रहा है, जिससे कॉलेज में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है और मरीज़ों को बेहतर इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
