‘मधुशाला’ के रचयिता हरिवंश राय बच्चन की 118वीं जयंती आज

देहरादून: हिंदी साहित्य को अपनी अद्वितीय कृतियों से गौरवान्वित करने वाले महान कवि, लेखक और ‘उत्तर-छायावाद’ काल के प्रमुख हस्ताक्षर पद्मभूषण डॉ. हरिवंश राय बच्चन जी की जयंती आज (27 नवंबर) पूरे देश में मनाई जा रही है। उनका जन्म 27 नवंबर, 1907 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में हुआ था।

‘बच्चन’ जी की कालजयी काव्य धारा ने न केवल हिंदी भाषा को एक नई पहचान दी, बल्कि उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से जीवन के दर्शन, मस्ती और यथार्थ को अत्यंत सरल शब्दों में पिरोया।

हरिवंश राय बच्चन का नाम आते ही उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध और विवादास्पद कृति ‘मधुशाला’ (1935) की पंक्तियाँ पाठकों के मन में गूँज उठती हैं। इस कृति ने उन्हें साहित्य जगत में अमर बना दिया। ‘मधुशाला’ को लेकर शुरुआती दौर में काफी विवाद हुआ था, लेकिन महात्मा गांधी के सामने जब बच्चन जी ने इस रचना का पाठ किया, तो गांधी जी ने इसे ‘इसमें तो कोई खराबी नहीं है’ कहकर विवाद को शांत कर दिया।

यह रचना केवल शराब और मादकता की बात नहीं करती, बल्कि जीवन की क्षणभंगुरता, मानव एकता और दार्शनिक पहलुओं को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त करती है। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ— “मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षणभर जीवन, मेरा परिचय”—उनके जीवन दर्शन को दर्शाती हैं।

‘बच्चन’ जी की रचनात्मकता केवल ‘मधुशाला’ तक सीमित नहीं थी। उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल हैं: ‘मधुबाला’, ‘मधुकलश’, ‘निशा निमंत्रण’, ‘एकांत संगीत’, ‘सतरंगिनी’, ‘मिलन यामिनी’ और ‘दो चट्टानें’। क्या भूलूं क्या याद करूं’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’ और ‘दशद्वार से सोपान तक’। यह आत्मकथा हिंदी साहित्य की एक कालजयी कृति मानी जाती है।

उन्हें उनकी कृति ‘दो चट्टानें’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। साहित्य में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण (1976) और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से भी अलंकृत किया गया।

उनकी रचनाएँ पाठकों के मन में सदैव साहित्यिक चेतना, जीवन के प्रति आशा और एक मस्ती भरा दृष्टिकोण संचारित करती रहेंगी। हिंदी साहित्य जगत उन्हें हमेशा एक ऐसे कवि के रूप में याद रखेगा जिसने अपनी सरल, किंतु गहरी, कविता से पीढ़ियों को प्रेरित किया।