मातृत्व के दिव्य प्रेम का प्रतीक अहोई अष्टमी: संतान की रक्षा के लिए माताएं करती हैं तारों का दर्शन

अहोई अष्टमी का पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद और दीपावली से लगभग एक सप्ताह पहले आता है।

यह व्रत मुख्य रूप से मातृत्व के दिव्य प्रेम और संतान की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है। इसके मनाए जाने के पीछे मुख्य कारण और महत्व निम्नलिखित हैं:

-संतान की दीर्घायु और कल्याण का संकल्प

यह व्रत माताएं अपनी संतान के जीवन से संभावित अनहोनी को टालने और उन्हें दीर्घायु प्रदान करने के लिए रखती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और माता अहोई की सच्चे मन से पूजा करने से संतान के जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और उनका उज्जवल भविष्य सुनिश्चित होता है।

– देवी पार्वती का ‘अहोई माता’ स्वरूप

अहोई माता को देवी पार्वती का ही एक रूप माना जाता है, जो संतान की रक्षिका हैं। इस दिन माताएं पूरे दिन निर्जला (बिना अन्न-जल के) व्रत रखती हैं और संध्या के समय या रात को तारों को देखकर अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण करती हैं।

-पौराणिक कथाएँ और महत्व

अहोई अष्टमी के महत्व को बताने वाली कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथा इस प्रकार है:

सेही का श्राप और माता अहोई की कृपा: एक प्रचलित कथा के अनुसार, एक गाँव में एक साहूकार रहता था, जिसकी सात बहुएँ और सात पुत्र थे। एक बार कार्तिक मास में साहूकार की छोटी बहू जंगल में गई और वहाँ उसने सेही (कांटेदार मूषक) के बच्चों को देखकर डर के मारे उन्हें खुरपी से हटा दिया, जिससे सेही के बच्चे मर गए। क्रोधित होकर सेही ने साहूकार की बहू को संतान-हानि का श्राप दे दिया।

श्राप के कारण बहू की एक-एक कर सभी संतानें समाप्त हो गईं। दुखी होकर बहू ने अपनी सास को पूरी बात बताई। सास ने बहू को अहोई माता का व्रत करने की सलाह दी।

बहु ने माता अहोई (देवी पार्वती) की सच्चे मन से आराधना की और अपने पापों की क्षमा माँगी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर अहोई माता ने उसकी सभी संतानों को जीवनदान दिया।

तभी से यह मान्यता है कि जो माता इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखती है, उसकी संतान की रक्षा स्वयं अहोई माता करती हैं।

– निःसंतान दंपति के लिए वरदान

उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में यह व्रत संतान प्राप्ति की कामना के लिए भी रखा जाता है। मथुरा में राधा कुंड में इस दिन स्नान करने की विशेष परंपरा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जिन दंपतियों को संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा है, वे अहोई अष्टमी के दिन राधा कुंड में स्नान कर अहोई माता का पूजन करते हैं, जिससे उन्हें संतान सुख प्राप्त होता है।

संक्षेप में, अहोई अष्टमी करवा चौथ के समान ही एक कठोर व्रत है, लेकिन यह पति की जगह संतान के लिए रखा जाता है, जहाँ माता का प्रेम एक अदृश्य सुरक्षा चक्र बनकर अपनी संतान की रक्षा करता है।